
इंदौर को आधुनिक नगर मानकर प्राय: इतिहासकारों व पुरातत्ववेत्ताओं ने यह धारणा बना ली थी कि इंदौर का इतिहास तीन चार सौ वर्षों से अधिक पुराना नहीं है। यह प्रचलित मान्यता को खंडित करने वाली एक घटना उस समय घटित हुई जब एक मशहूर लेखक ने इंदौर के पूर्वी भाग में आजाद नगर के समीप कुछ मिट्टी के बर्तनों के टुकड़े, हाथी दाँत की बनी चूड़ियाँ और तम्रमुद्राएँ सन् 1971 में खोज निकाली। इस उपलब्धि ने पुरातत्ववेत्ता और इतिहासकारों का ख़ास ध्यान इंदौर शहर की ओर आकर्षित किया। इसके साथ ही आगे अनुसंधान करने के लिये प्रेरित किया। इस उपलब्धि की अनुगूँज भारतीय संसद तक जा पहुँची। संसद में जब घोषित किया गया कि आजाद नगर इंदौर में हड़प्पाकालीन सभ्यता के अवशेषों की प्राप्ति हुई है तो इंदौरवासियों के हर्ष में असीमित वृद्धि देखते ही बनती थी।
