ईसाई समुदाय द्वारा देश की समृध्दि, शांति और एकता के लिए इंदौर में प्रार्थना सभा का आयोजन 10 अप्रैल को किया था, इस कार्यक्रम की अनुमति जिला प्रशासन ने सुनवाई का अवसर दिये बिना निरस्त कर दी थी। सुप्रीम कोर्ट ने अब यह अनुमति दे दी है। ईसाई समाज द्वारा यह आयोजन शीघ्र ही किया जाएगा। आयोजकों ने पत्रकार वार्ता में बताया कि ईसाई समाजजन द्वारा 72 घंटे की प्रार्थना करना प्रस्तावित था और अंतिम दिवस अभय प्रशाल में एक सामूहिक प्रार्थना सभा का आयोजन होना था। इसके लिए ईसाई समाज ने अनुमति प्राप्त करने के साथ-साथ जिला और पुलिस प्रशासन के सहयोग से समस्त तैयारियां भी पूर्ण कर ली थी, लेकिन ऐनवक्त पर कुछ कतिपय संगठनों की शिकायतों पर इस आयोजन की अनुमति निरस्त कर दी गई। इस आदेश के खिलाफ समाजजन पहले उच्च न्यायालय इंदौर पहुंचे यहां से राहत नहीं मिली तो तुरंत उच्चतम न्यायालय नई दिल्ली में याचिका लगाई गई, जहां से उच्चतम न्यायालय ने समाज को राहत दी है। डॉ. सुरेश कार्लटन ने कहा कि इन शिकायतकर्ताओं के खिलाफ ईसाई समुदाय जिला और पुलिस प्रशासन से कार्यवाही की मांग करता है। उन्होंने बताया कि ईसाई समुदाय के जिन व्यक्तियों के खिलाफ कुछ झूठे आरोप लगाये थे वे सभी यहां उपस्थित हैं। समुदाय के किसी भी व्यक्ति के खिलाफ कोई भी मुक़दमा धर्मांतरण के संबंध में किसी भी थाने पर दर्ज नहीं है। यही नहीं जिन जिन लोगों के खिलाफ आरोप लगाये गये हैं यह सभी ने अलग-अलग थाना क्षेत्रों में विघ्नसंतोषियों के खिलाफ शिकायतें प्रस्तुत करेंगे और इन सभी के खिलाफ झूठी अफवाह फैलाने, अनर्गल आरोप लगाने और मानहानिकारक शब्दों का उपयोग करने के खिलाफ प्रकरण दर्ज करने की मांग की जाएगी। 55 वर्षों में एक भी मामला साबित नहीं हुआ।
धर्मांतरण अधिनियम 1968 में बनाया गया था, इसके बाद इसमें संशोधन 2021 में किया गया। पिछले 55 वर्षों में आज तक एक भी केस नहीं है जिसमें धर्मांतरण साबित हुआ हो। ईसाई समुदाय के खिलाफ जिस तरह के अनर्गल और झूठे आरोप लगाये जा रहे हैं, इससे समाजजन व्यथित है। समाज इस तरह के किसी भी अवैधानिक कार्य में न तो लिप्त था और न ही लिप्त है।
