
जब तक जीवन में सदगुरू का पदार्पण नहीं होता, तब तक मनुष्य इधर से उधर संसार के विषयों में भटकता रहता है, लेकिन सदगुरू का सानिध्य मिलते ही जीवन में नया सोच, नया विचार और नया संकल्प संभव हो जाता है। वास्तव में हम अपने पूरे जीवन में अपने लिए कुछ भी नहीं कर पाते हैं। हमारे जितने भी कर्म हैं, वे सब दूसरों के लिए ही होते हैं। अंतर्राष्ट्रीय रामस्नेही संप्रदाय के मूल आचार्य स्वामी रामचरण महाराज एक ऐसे ही सदगुरू थे, जिन्होंने अपने त्याग और समर्पण से रामस्नेही संप्रदाय को सारी दुनिया तक पहुंचाया। ये विचार हैं रामस्नेही संप्रदाय आलोट के संत हरसुखराम महाराज के, जो उन्होंने छत्रीबाग रामद्वारा पर संप्रदाय के मूल आचार्य स्वामी रामचरण महाराज के 304वें जन्म जयंती महोत्सव के शुभारंभ प्रसंग पर व्यक्त किए। छत्रीबाग रामद्वारा ट्रस्ट के रामसहाय विजयवर्गीय एवं रामनिवास मोड़ ने बताया कि महोत्सव का शुभारंभ स्वामी रामचरण महाराज के चित्र पर माल्यार्पण के साथ हुआ। महोत्सव का मुख्य आयोजन 23 फरवरी को सुबह होगा, जिसमें 6.30 बजे आचार्य रामचरण महाराज की पालकी यात्रा रामद्वारा से प्रारंभ होकर त्रिलोकचंद स्कूल, छत्रीपुरा थाना, राजस्व ग्राम, व्यंकटेश मंदिर मार्ग, भूरा पहलवान के घर के सामने से होते हुए पुनः रामद्वारा पहुंचेगी। रामद्वारा पर परंपरा अनुसार वाणीजी के पाठ, प्रवचन, भजन, लावणी, आरती, रामधुन एवं प्रसाद वितरण जैसे कार्यक्रम होंगे। महोत्सव में प्रतिदिन 8.45 से 9.45 बजे तक सत्संग प्रवचन होंगे। स्वामी हरसुखराम महाराज ने अपने सत्संग में कहा कि सदगुरू के सानिध्य में आते ही सब कुछ बदल जाता है। जब तक सही ज्ञान प्राप्त न हो, तब तक मनुष्य का भटकाव बना रहता है। सदगुरू अपने शिष्य के कल्याण की दिशा में हर संभव प्रयास करते हैं। उनका जीवन स्वयं के लिए नहीं, दूसरों के लिए ही होता है, जबकि हम जो कुछ करते हैं वह केवल अपने स्वयं के हित के लिए करते हैं। धनार्जन से लेकर हमारे जीवन के सभी कर्म दूसरों के लिए ही होते हैं, अपनी आत्मा के पोषण के लिए ध्यान देने का समय भी हम नहीं निकाल पाते हैं। आचार्य रामचरण महाराज ने दुनिया को एक ऐसा पंथ दिया है, जिसकी प्रासंगिकता हर युग में बढ़ती जा रही है।
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